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 इससे ही बुनता हूं मैं,
इन बेरंग आंखो मे,
तेरे रंगीन सपने।
-की-धूप-और-चाय-इससे-ही-बुनता-हूं-मैं

सुबह की धूप और चाय, इससे ही बुनता हूं मैं, इन बेरंग आंखो मे, तेरे रंगीन सपने।

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सुबह की धूप और चाय,
इससे ही बुनता हूं मैं,
इन बेरंग आंखो मे,
तेरे रंगीन सपने। ❤
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Source by Anish Jha