रखे है लज़्ज़त-ए-बोसा से मुझ को गर महरूम.., तो अपने तू भी न होंटों तलक ज़बाँ पहु

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रखे है लज़्ज़त-ए-बोसा से मुझ को गर महरूम..,
तो अपने तू भी न होंटों तलक ज़बाँ पहुँचा…
— जुरअत क़लंदर बख़्श..!

#JuratQalandarBakheh
#Shayari
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Source by Harshal Jadhav

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