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वजूद मेरा कहाँ से ये मन उठा लाया

थे सिलवटों से जो म
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उदास और परेशान रहता है हरदम वजूद मेरा कहाँ से ये मन उठा लाया थे सिलवटों से जो म

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उदास और परेशान रहता है हरदम
वजूद मेरा कहाँ से ये मन उठा लाया

थे सिलवटों से जो मिसरे ग़ज़ल के माथे पर
बस एक क़ाफ़िया सारी शिकन उठा लाया

~ गौतम राजऋषि

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Source by गौतम की कलम से

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