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अपनी कलाई की इक चूड़ी…इक कंगन दे दे

चुप्पा
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आज लफ़ंगे चाँद को थोड़ा और चिढ़ाऊँगा अपनी कलाई की इक चूड़ी…इक कंगन दे दे चुप्पा

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आज लफ़ंगे चाँद को थोड़ा और चिढ़ाऊँगा
अपनी कलाई की इक चूड़ी…इक कंगन दे दे

चुप्पा-चुप्पा दिल ये तेरा रख ले अपने पास
सीने में जो शोर मचाये…वो धड़कन दे दे

~ गौतम राजऋषि

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Source by गौतम की कलम से

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