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Kamada Ekadashi Vrat – कामदा एकादशी व्रत



कामदा एकादशी व्रत कथा

एक समय की बात है पुण्डरीक नामक राजा नागलोक में राज्य करता था. राजा अत्यधिक विलासी था और उसकी सभा में अनेकों अप्सराएँ, गंधर्व व किन्नर नृत्य करते थे. एक बार की बात है कि उसकी सभा में ललित नाम का एक गंधर्व नृत्य कर रहा था और अचानक नृत्य करते हुए उसे अपनी पत्नी का ध्यान हो गया जिससे उसका नृत्य अरुचिकर लगने लगा. उसी सभा में कर्कट नाम का भांड था जिसने ललित की बात को जान लिया और राजा को जाकर कह दिया.

पुण्डरीक नागराज को यह बात सुनकर बहुत क्रोध आया और उसने ललित को राक्षस बन जाने का शाप दे दिया. ललित नाम का गंधर्व सहस्त्रों वर्षों तक राक्षस योनि में अनेकों लोकों में भटकता रहा. ललित की पत्नी ललिता भी अपने पति का अनुसरण कर उसी के साथ भटकती रही. एक बार घूमते-घूमते दोनों शापित दंपत्ति विन्ध्याचल पर्वत के शिखर तक पहुंच गए जहाँ उन्हें श्रृंगी नामक मुनि का आश्रम मिला.

दोनों की करुणाजनक हालत देखकर मुनि को उन पर दया आ गई. श्रृंगी मुनि दोनो को चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत रखने की सलाह देते हैं. मुनि की बात सुन दोनों उनके बताए नियमों का पालन करते हैं और कामदा एकादशी का व्रत रखते हैं. व्रत रखने के प्रभाव से इन दोनों का श्राप खतम हो जाता है. दोनो दिव्य शरीर को प्राप्त कर स्वर्गलोक में जाते हैं.

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Kamada Ekadashi Vrat – कामदा एकादशी व्रत
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