वो अहदे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे-नक़्शे फ़रियादी-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

वो अहदे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे-नक़्शे फ़रियादी-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz वो अह्दे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे जो उनकी मुख़्तसर रूदाद भी सब्र-आज़मा समझे यहाँ वाबस्तगी, वाँ बरहमी , क्या जानिए क्यों है न हम अपनी नज़र समझे, न हम उनकी अदा समझे फ़रेबे-आरज़ू की …

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