Rahat Indori sahab shayari, मैं गांव बोल रहा हूं

मैं गांव बोल रहा हूं …

टूट गया था मैं, अब हौसला बढ़ने की दस्तक आयी है ,
चलो देर से सही, किसी बहाने मेरे यहाँ रौनक तो छायी है ,
तुम मुझे कौड़ियों के भाव बेच कर भागते रहे, फिर भी
मैं तुम्हें खुली बांहों से स्वीकार रहा हूं
मैं तुम्हारा गांव बोल रहा हूं ।।

अकेला तड़पता था मैं तुम्हारी आवाज के खातिर
सुनता था सूनेपन को तुम्हारी छाज के खातिर
ताला जड़ दिया था तुमने मुझपर
अपनी शहरियत की शौक़ के खातिर
मैं सब कुछ भुलाकर तुझे अपना रहा हूं
मैं तुम्हारा गांव बोल रहा हूं ।।

अब लौट आए हो तो यहीं रह जाना
सब कुछ दूंगा तुम्हें , हमारी संतान हो तुम
वो जो मजदूर कहते हैं , उन्हें क्या पता देश की शान हो तुम
बस तुम्हारे आने भर से खिलखिला रहा हूँ
देखो ना मैं जगमगाते दियों सा झिलमिला रहा हूँ
सुनो…. तुम्हारा गांव बोल रहा हूं ।।

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