ज़िन्दगी इतनी मुख़्तसर भी नहीं

इस भरी कायनात में या रब
अपने रहने को एक घर भी नहीं
पेड़ के नीचे जो गुज़र जाए
ज़िन्दगी इतनी मुख़्तसर भी नहीं
रेख़्ता पटौलवी

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