संध्या की इस गोधूली में (बाबा साहब का संघर्ष)- अजय शोभने

संध्या की इस गोधूली में (बाबा साहब का संघर्ष)अजय शोभने

संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है,

कितना भी रोकूं इस हृदय को, पर नयनों की गागर भर जाती है ।

‘जातिवाद’ से लड़ने की ऐसी वो अमिट कहानी है,

संघर्षों की वेदि पर बलि कर दी वही ‘जिन्दगानी’ है !

युगों-युगों तक याद रहेगी तेरी मूल-मंत्र सी वाणी है,

आज हवा बह बह के कहती, बड़ी संघर्ष भरी कहानी है !

संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है,

कितना भी रोकूं इस हृदय को, पर नयनों की गागर भर जाती है !

‘मूल निवासी बहुजनों’ की घनीनिशा के चन्द्र आप हैं,

‘भारतीय संविधान’ के, स्वर्णिम वैभव-जनक आप हैं !

विश्वज्ञानी-विधिवेत्ताओं में सौरमण्डल के सूर्य आप हैं,

हिमालय से भी ऊंची, बाबा साहब की गौरवमयी कहानी है !

संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है,

कितना भी रोकूं इस हृदय को, पर नयनों की गागर भर जाती है !

हवा से विमुख हो, देखो वो, तूफानों से खेल गये हैं,

मानसरोवर के हंसों में, वो परमहंस बन तैर गये हैं !

समता स्थापित कर, बुद्ध के वे बोधिसत्त्व हो गये हैं,

सागर से भी गहरी, बाबा साहब तेरी अमिट कहानी है !

संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है,

कितना भी रोकूं इस हृदय को, पर नयनों की गागर भर जाती है !

अंधकार भरे इस देश के, वो प्रकाशपुन्ज हो गये हैं,

बेसहारों के सहारा बन, वो जगत मसीहा हो गये हैं !

भारत रत्न फीका पड़ गया, वो विश्व रत्न हो गये हैं,

विश्व ज्ञान दिवस पर, करुणामय की अमिट कहानी है !

संध्या की इस गोधूली में, बाबा साहब याद आपकी आ जाती है,

कितना भी रोकूं इस हृदय को, पर नयनों की गागर भर जाती है !

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