मोड़ पर- अटल बिहारी वाजपेयी

मुझे दूर का दिखाई देता है,
मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूँ,
मगर हाथ की रेखाएं नहीं पढ़ पाता।
सीमा के पार भड़कते शोले
मुझे दिखाई देते हैं।

पर पांवों के इर्द-गिर्द फैली गर्म राख
नज़र नहीं आती ।
क्या मैं बूढ़ा हो चला हूँ?
हर पच्चीस दिसम्बर को
जीने की एक नई सीढ़ी चढ़ता हूँ
नए मोड़ पर
औरों से कम
स्वयं से ज्यादा लड़ता हूँ।

मैं भीड़ को चुप करा देता हूँ,
मगर अपने को जवाब नही दे पाता,
मेरा मन मुझे अपनी ही अदालत में खड़ा कर,
जब जिरह करता है,
मेरा हल्फनामा मेरे ही खिलाफ पेश करता है,
तो मैं मुकद्दमा हार जाता हूँ,
अपनी ही नजर में गुनहगार बन जाता हूँ।

तब मुझे कुछ दिखाई नही देता,
न दूर का, न पास का,
मेरी उम्र अचानक दस साल बड़ी हो जाती है,
मैं सचमुच बूढ़ा हो जाता हूँ।

(25 दिसम्बर 1993, जन्म-दिवस पर)

मेरी इक्यावन कविताएँ अटल बिहारी वाजपेयी | Meri Ekyavan Kavitayen Atal Bihari Vajpeyi | अनुभूति के स्वर

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