बाप-हिन्दी कविता प्रो. अजहर हाशमी

पर्वत – शिखर – सा बाप, है सिंधु सा गहन भी,
रिश्तों को निभाता है, निभाता है वचन भी।
झिड़की भी,नसीहत भी, मृदुल-मीठी डांट भी,
बच्चों के लिए बाप दुआओं का चमन भी।
परिवार के हित के लिए पीड़ा की पोटली,
नित बाप उठाता भी है,करता है वहन भी।
तूफान तनावों के मुस्कुराके झेलता,
माथे पे बाप के न कभी पड़ती शिकन भी।
यूं तो चलन समाज का माना है बाप ने,
बच्चों की खुशी के लिए तोड़ा है चलन भी।
हो सकता है अपवाद कहीं बाप, परंतु,
सच ये है बाप मित्र भी, सुख-चेन, अमन भी।
बच्चों के लिए आहुति देता है स्वयं की,
‘होता’ भी है, ‘हविष्य’ भी, खुद बाप ‘हवन’ भी।

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