जिसके चरण-चरण (बुद्ध मुझे, अंधकार से निकालें)- अजय शोभने

जिसके चरण-चरण (बुद्ध मुझे, अंधकार से निकालें)- अजय शोभने

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,

मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

छला गया हूँ, अंधश्रद्धा-अंधविश्वासों से,

बस अब तो सत्य-मार्ग का ज्ञाता चाहिए !

शील, समाधी, प्रज्ञा, से भवन हो निर्मित,

मुझको अपना वो, स्वर्णिम तीर्थ चाहिए !

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,

मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

भेद-भाव ने किया है कलुषित मेरे चित्त को,

समता स्थापित करने वाला, वो धम्म चाहिए !

अहिंसा सदाचरण विद्या हो आभूषण जिसके,

मुझको बस ऐसा अपना आराध्यदेव चाहिए !

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,

मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

नहीं मिला कभी किसी को सुख शान्ति पथ,

अस्त्र-सस्त्र, धनुष-वाण और बम-बारूदों से !

फूल खिले हैं हरदम करुणा मैत्री भाईचारे से,

बैर अबैर से मिटा सके, ऐसा वो देव चाहिए !

जिसके चरण-चरण हों, करुणा से गर्वित,

मुझको बस ऐसा, सम्यक सम्बुद्ध चाहिए !

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