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कि उसके इल्म में कहीं कोई  मिलावट है ।
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शायरी जब सियासी ज़ुबाँ बोले तो लगता है – कि उसके इल्म में कहीं कोई  मिलावट है । …

शायरी जब सियासी ज़ुबाँ बोले तो लगता है –
कि उसके इल्म में कहीं कोई  मिलावट है ।
तुम तो रिश्तों पे लिखते थे न क्या हुआ तुमको-
बिलखती माँ-बहनों की चीखें सुनाई देती नहीं तुमको
वतन सरहद नहीं आवाम के दिल में बसते हैं ।
तालिबाँ के लिए मोहब्बत क्योंकर दिल में बसती है ।।
@amitwip https://t.co/u1RFmWS0MC
शायरी जब सियासी ज़ुबाँ बोले तो लगता है –
कि उसके इल्म में कहीं कोई  मिलावट है ।

शायरी जब सियासी ज़ुबाँ बोले तो लगता है –
कि उसके इल्म में कहीं कोई  मिलावट है ।
तुम तो रिश्तों पे लिखते थे न क्या हुआ तुमको-
बिलखती माँ-बहनों की चीखें सुनाई देती नहीं तुमको
वतन सरहद नहीं आवाम के दिल में बसते हैं ।
तालिबाँ के लिए मोहब्बत क्योंकर दिल में बसती है ।।
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Twitter shayarish by Girish Mukul

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