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पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम…
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भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम…

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भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले
पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है

कुहासा हाय कैसा ये उतर आया है साहिल पर
सजीले-से, छबीले-से समन्दर का बदन गुम है

~गौतम राजऋषि

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Source by गौतम की कलम से

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