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मेरे अल्फ़ाज़ को तासीर दे…आ गुनग…
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तसव्वुर, ख़्वाब, उल्फ़त या मुहब्बत से सजा मुझको मेरे अल्फ़ाज़ को तासीर दे…आ गुनग…

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तसव्वुर, ख़्वाब, उल्फ़त या मुहब्बत से सजा मुझको
मेरे अल्फ़ाज़ को तासीर दे…आ गुनगुना मुझको

जुनूँ सर से फिसल कर दिल में जाने कब उतर आया
कि या अब तू है या कोई नहीं तेरे सिवा मुझको

~ गौतम राजऋषि

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Source by गौतम की कलम से

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